Friday, April 21, 2023

साथ (ii)

मैं तुम्हें तुम्हारे साथ से पहचानता हूं 
वो साथ जो मुझे जीवंत कर देता है
जैसे किसी बंद कमरे को ज़िंदा कर
जाता है उसके किवाड़ का खुलना।

अब हमेशा ही यूं हो कि जो दरवाज़ा 
खुले और कोई अंदर आ ही सके, ये
तो मुमकिन नहीं है देखो, और न 
इसमें कमी दस्तकगार की है।

क्या रोशनी की सेंध का एक धागा  
काफ़ी नहीं है, उस चौखट बंधे कमरे 
के वजूद को साबित करने के लिए?

3 comments:

  1. How lovely is this. The opening and closing stanzas particularly spoke to me.

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  2. Roshni ki sendh ka ek dhaga - what a lovely image.

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